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जम्मू-कश्मीर में ISI की नई साजिश! राजनीतिक दलों में घुसपैठ के जरिए आतंकी नेटवर्क बचाने की कोशिश

01 Jun 2026 · 11:12 AM ·

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और उसके नेटवर्क को बचाने के लिए पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) नई रणनीति पर काम कर रही है. खुफिया एजेंसियों ने बताया कि आतंकी घटनाओं की जांच से बचने के मकसद से ISI ने अपने ‘ओवर ग्राउंड वर्कर्स’ (OGWs) के पहले से बने नेटवर्क को राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों में घुसपैठ करने के निर्देश दिए हैं. उनके मुताबिक, इस रणनीति का मकसद आतंकवाद के हमदर्दों को वैध राजनीति का हिस्सा दिखाकर सुरक्षा बलों की निगरानी और कार्रवाई से बचाना है. ये वही लोग हैं जो आतंकी संगठनों को लॉजिस्टिक मदद, भर्ती और फंडिंग मुहैया कराने में भूमिका निभाते हैं. चौंकाने वाली जानकारी श्रीनगर पुलिस द्वारा गिरफ्तार OGWs से पूछताछ के दौरान सामने आई है. केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों के अनुसार, जांच में पता चला कि इनमें से कुछ लोग राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों के सदस्य भी थे. इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) की योजना अपने नेटवर्क को राजनीतिक गतिविधियों की आड़ में छिपाने की है, ताकि किसी भी कार्रवाई के दौरान उनके कार्यकर्ताओं को सुरक्षा एजेंसियों के संदेह से बचाया जा सके.

एक अधिकारी के मुताबिक, ISI की योजना केवल घुसपैठ तक सीमित नहीं है. वो अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए 90 के दशक के उन आतंकी संगठनों को भी सक्रिय करने की कोशिश कर रही है, जो लंबे समय से निष्क्रिय पड़े हैं. पाकिस्तान ऐसा इसलिए कर रहा है ताकि कश्मीर में आतंकी गतिविधियों को स्थानीय आंदोलन के रूप में पेश किया जा सके. पाकिस्तान पर फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की लगातार नजर बनी हुई है, जो मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद के वित्तपोषण पर निगरानी रखती है. ISI ऐसे तरीके तलाश रही है, जिनसे आतंकी नेटवर्क सक्रिय भी रहें और पाकिस्तान की प्रत्यक्ष संलिप्तता भी उजागर न हो. इसी कारण पुराने स्थानीय नेटवर्क का इस्तेमाल करने की रणनीति अपनाई जा रही है.

नाम न छापने की शर्त पर अधिकारियों ने कहा कि ISI की रणनीति उसकी हताशा को दर्शाती है. उनका कहना है कि सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों के कारण पारंपरिक आतंकी संगठनों पर भारी दबाव है और नए छद्म संगठनों के लिए स्थानीय समर्थन भी काफी कम हो चुका है. ऐसे में ISI नई पीढ़ी को प्रभावित कर नेटवर्क को राजनीतिक सुरक्षा देने की कोशिश में है. सुरक्षा एजेंसियों ने यह भी पाया है कि घेराबंदी और तलाशी अभियान के दौरान जब किसी OGW को पकड़ा जाता है तो वह अक्सर राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों के साधारण सदस्यता कार्ड दिखाकर खुद को बचाने की कोशिश करता है. हालांकि, अधिकारियों का कहना है कि ऐसी कोशिशें अक्सर नाकाम रहती हैं और सुरक्षा एजेंसियां पूरी जांच के बाद ही कार्रवाई करती हैं.

सुरक्षा अधिकारियों ने बताया कि यह तरीका समय के साथ बदलता रहा है. 1990 के दशक के आखिर में संदिग्ध लोग पुलिस से बचने के लिए वोटर आईडी कार्ड का इस्तेमाल करते थे. इसके बाद के वर्षों में वे आधार कार्ड का सहारा लेने लगे. अब सुरक्षा एजेंसियों ने देखा है कि कुछ लोग राजनीतिक दलों की सदस्यता को सुरक्षा कवच की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं.

ऐसे मामलों में किसी भी राजनीतिक नेतृत्व द्वारा कभी हस्तक्षेप नहीं किया गया है. जांच एजेंसियां अपने स्तर पर कार्रवाई करती हैं और तथ्यों के आधार पर ही आगे बढ़ती हैं. किसी राजनीतिक दल की सामान्य सदस्यता किसी व्यक्ति को जांच या कानूनी कार्रवाई से नहीं बचा सकती. सुरक्षा एजेंसियां उन आतंकी संगठनों के नाम फिर से सामने आने पर भी कड़ी नजर रख रही हैं.

इन्होंने 1990 के दशक और 2000 के शुरुआती वर्षों में जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खूनी दौर को परिभाषित किया था. इनमें अल-उमर मुजाहिदीन, अल-बद्र और तहरीक-उल-मुजाहिदीन जैसे संगठन शामिल हैं. इन निष्क्रिय संगठनों को दोबारा सक्रिय करने की कोशिश की जा रही हैं. इन संगठनों को पुनर्जीवित कर ISI एक झूठा नैरेटिव पेश करना चाहती है.

उसका उद्देश्य यह दिखाना है कि जम्मू-कश्मीर में हिंसा कोई सीमा पार से संचालित प्रॉक्सी वॉर नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर का आंदोलन है. हालांकि, सुरक्षा एजेंसियों का दावा है कि इन संगठनों का शीर्ष नेतृत्व अब भी पाकिस्तान और पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर में सुरक्षित ठिकानों पर मौजूद है. कश्मीर में बदली हुई परिस्थिति में वापस आने को बेकरार है. इन फिर से सक्रिय किए जा रहे नेटवर्कों का इस्तेमाल दुष्प्रचार फैलाने, फंडिंग जुटाने और युवाओं में कट्टरपंथ को बढ़ावा देने के लिए किया जा सकता है. यही वजह है कि केंद्रीय खुफिया एजेंसियां इन गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और OGWs द्वारा तैयार किए जा रहे लॉजिस्टिक नेटवर्क को ध्वस्त करने की दिशा में काम कर रही हैं.