📌 लखनऊ के ठाकुरगंज से दबोचा गया हत्या का मुख्य आरोपी मोहम्मद फहीम उर्फ अली भाई
🪵 1997 में राजौरी गार्डन इलाके में लोहे की रॉड से हत्या कर बेड बॉक्स में छिपा दी थी लाश
🛑 नाम बदला, शहर बदले — नागपुर, मुंबई और लखनऊ के बीच पहचान छिपाकर काट रहा था फरारी
📊 बिना किसी डिजिटल डेटाबेस या नई फोटो के क्राइम ब्रांच की सेंट्रल रेंज ने खुफिया नेटवर्क से रचा इतिहास
⚖️ 29 साल बाद इंसाफ की दस्तक: अयोध्या के रहने वाले मृतक शरीफ हसन खान के परिवार का इंतजार खत्म
29 साल पुराना राज़ — बेड बॉक्स में छिपाई थी लाश, लखनऊ से पकड़ा गया कातिल!
➤ 29 साल — एक खून, एक फरार, एक इंतज़ार
14 मार्च 1997। पश्चिमी दिल्ली के राघोपुर नगर स्थित टीसी कैंप में एक बंद कमरे से अचानक एक अज्ञात व्यक्ति की सड़ी-गली लाश मिलने से हड़कंप मच गया था। पुलिस तफ्तीश में खुलासा हुआ कि मृतक 58 वर्षीय शरीफ हसन खान हैं — जो मूल रूप से उत्तर प्रदेश के फैजाबाद (अब अयोध्या) के रहने वाले थे और दिल्ली के राजौरी गार्डन की एक कपड़े की दुकान में काम करते थे।
वारदात को अंजाम देकर शातिर हत्यारा मौके से रफूचक्कर हो चुका था। समय बीतने के साथ निचली अदालत ने उसे भगोड़ा (PO) घोषित कर दिया और इसी के साथ शुरू हुई — कानून की आंखों में धूल झोंकने वाले कातिल की 29 साल लंबी लुका-छिपी की कहानी।
वर्षों लंबी फरारी
वारदात का साल
गिरफ्तारी का वर्ष

➤ पैसों की चोरी — और फिर बेरहमी से खून
पूछताछ में सामने आया कि आरोपी मोहम्मद फहीम उन दिनों काम की तलाश में नया-नया दिल्ली आया था और इसी दौरान उसकी मुलाकात शरीफ हसन खान से हुई थी। धीरे-धीरे दोनों में दोस्ती हो गई। 13 मार्च 1997 की रात फहीम ने नीयत खराब होने पर शरीफ हसन खान के रखे हुए पैसे चुरा लिए, जिसे लेकर दोनों के बीच तीखी बहस और विवाद शुरू हो गया।
विवाद इस कदर बढ़ा कि फहीम ने पास रखी लोहे की भारी रॉड से खान के सिर पर कई ताबड़तोड़ वार कर दिए। जब वह लहुलूहान होकर गिर गए, तो उसने रस्सी से गला घोंटकर उनकी बेरहमी से हत्या कर दी। साक्ष्य छुपाने के इरादे से उसने लाश को कमरे में ही एक लकड़ी के बेड बॉक्स के अंदर बंद कर दिया और ताला लगाकर दिल्ली से फरार हो गया।
➤ 29 साल की छुपन-छुपाई — नाम बदला, जगह बदली
क्राइम ब्रांच के हत्थे चढ़े फहीम ने कबूल किया कि दिल्ली से भागने के बाद वह सीधे महाराष्ट्र के नागपुर पहुंचा। उसने गिरफ्तारी से बचने के लिए अपना असली नाम और पहचान पूरी तरह बदलकर खुद को “अली भाई” घोषित कर दिया।
अगले 29 साल तक वह मुंबई, लखनऊ और नागपुर के बीच लगातार अपने ठिकाने बदलता रहा। इन वर्षों के दौरान उसने अपनी पहचान छुपाए रखने के लिए कंस्ट्रक्शन साइट्स पर प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) का काम करना शुरू कर दिया ताकि किसी भी सरकारी रिकॉर्ड या पहचान पत्र की जरूरत न पड़े और वह कानून की रडार से बाहर रहे।
➤ क्राइम ब्रांच का चक्रव्यूह: जब कोई सुराग नहीं था
इस बेहद पुराने मामले को हाल ही में दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच की सेंट्रल रेंज को पुनर्जांच (Re-investigation) के लिए सौंपा गया था। पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि 1997 का यह केस आधुनिक डिजिटल डेटाबेस, मोबाइल लोकेशन और आधार कार्ड के दौर से बहुत पहले का था। पुलिस के पास न तो आरोपी की कोई नई तस्वीर थी और न ही कोई सुराग।
क्राइम ब्रांच की टीम ने लीक से हटकर काम किया और आरोपी के पैतृक गांव में अपना एक बेहद मजबूत स्थानीय खुफिया (ह्यूमन इंटेलिजेंस) नेटवर्क एक्टिव किया। यहाँ से कड़ियां जुड़ीं और पता चला कि फहीम अभी जिंदा है और कभी-कभार भेष बदलकर इलाके के आसपास देखा जाता है। लगातार इलेक्ट्रॉनिक और मैन्युअल निगरानी के बाद उसकी सटीक लोकेशन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ट्रेस हुई। 3 जुलाई 2026 को लखनऊ के ठाकुरगंज में एक बेहद सीक्रेट और सुनियोजित जाल बिछाकर उसे दबोच लिया गया।
“यह केस हमारी टीम के लिए एक बड़ी परीक्षा थी। बिना किसी डिजिटल फुटप्रिंट या आधुनिक सुराग के, केवल पारंपरिक पुलिसिंग और मजबूत ह्यूमन इंटेलिजेंस के दम पर 29 साल पुराने कोल्ड केस के कातिल को ढूंढ निकालना असंभव को संभव करने जैसा है।”
— दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच (सेंट्रल रेंज वरिष्ठ अधिकारी वक्तव्य)
➤ न्याय में देरी — पर आखिरकार न्याय मिला
29 साल। यह सिर्फ कैलेंडर के पन्ने या एक संख्या नहीं है। यह उस पीड़ित परिवार की तीन दशकों की अंतहीन वेदना और न्याय की आस है, जिसने सालों पहले अपने घर के इकलौते कमाने वाले सदस्य को खो दिया था। यह दिल्ली पुलिस की उस जिद और प्रतिबद्धता की भी कहानी है जो यह साबित करती है कि फाइलें भले ही धूल खा जाएं, लेकिन “कोल्ड केस” कभी पूरी तरह ठंडे नहीं पड़ते।
1997 में राजौरी गार्डन के एक बंद कमरे के बेड बॉक्स में छिपाई गई थी लाश।
साल 2026 में लखनऊ की गलियों से खींचकर निकाला गया कानून का अपराधी।
देर से ही सही — पर गुनहगार के चौखट पर आखिरकार इंसाफ ने दस्तक दे दी है।
